
नई दिल्ली, 03 अगस्त । मुंबई-जयपुर चलती ट्रेन में हुए हत्याकांड और नूंह सांप्रदायिक दंगे को जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने नफरत की खेती का परिणाम करार दिया है। उन्होंने कहा कि सांप्रदायिक मानसिकता के लोगों की ओर से देश में पिछले 9 सालों से नफरत फैलाई जा रही है, यह घटनाएं उसी का परिणाम हैं।
मौलाना अरशद मदनी ने नूंह में होने वाले सांप्रदायिक दंगे को एक बड़ी और योजनाबद्ध साजिश करार देते हुए कहा कि प्रशासन की जानकारी में सब कुछ था। उसे यह भी मालूम था कि नासिर और जुनैद की निर्मम हत्या का फरार मुख्य आरोपी मोनू मानेसर नूंह में निकलने वाली धार्मिक यात्रा के सम्बंध में न केवल भड़काऊ वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड कर रहा है, बल्कि वह लोगों से इस यात्रा में भारी संख्या में शामिल होने की अपीलें भी कर रहा है। फिर भी पुलिस और प्रशासन ने यात्रा से पहले सावधानी नहीं बरती और न ही यह पता लगाने का प्रयास किया कि मोनू मानेसर कहां से अपनी वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर कर रहा है।
मौलाना मदनी ने कहा कि यह इस बात का पक्का सबूत है कि सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से हो रहा था। यह यात्रा अभी तीन साल से निकलनी शुरू हुई है। नूंह और इसके आस-पास के क्षेत्रों में मुस्लिम अधिक संख्या में हैं, ऐसे में न्यायपूर्ण यही था कि यात्रा से पहले पुलिस और प्रशासन की ओर से सावधानी बरती जाती। यात्रा में शामिल होने वालों को चेतावनी दी जाती कि वह भड़काऊ नारे न लगाएं, मगर पुलिस और प्रशासन ने ऐसा कुछ नहीं किया। इसलिए वही हुआ जिसका डर था।
उन्होंने कहा कि अब जगह-जगह मुसलमानों की एकतरफा गिरफ्तारियां हो रही हैं। मौलाना मदनी ने सवाल किया कि एकतरफा कार्यवाइयां क्यों हो रही हैं? उन्होंने इस बात पर घोर आश्चर्य प्रकट किया कि चलती ट्रेन में चार निर्दोष लोगों के निर्मम हत्यारे को अब मानसिक रोगी साबित किया जा रहा है, जबकि उसने एक विशेष धर्म के मानने वालों को गोलियों से भून दिया। मौलाना मदनी ने कहा कि यह दुनिया का ऐसा पहला मरीज है, जिसकी गोली केवल मुसलमानों को पहचानती है।
मौलाना मदनी ने कहा कि इन दोनों घटनाओं की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए और दोषी लोगों को बिना किसी भेदभाव के कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए, एकतरफा कार्रवाई कानून और न्याय के मुंह पर एक तमाचा है। मौलाना मदनी ने कहा कि निःसंदेह सांप्रदायिकता और धर्म के आधार पर नफरत पैदा करने से देश की स्थिति निराशाजनक है, लेकिन हमें निराश होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि सुखद बात यह है कि हर तरह के उकसावे के बावजूद देश का बहुसंख्यक वर्ग सांप्रदायिकता का विरोधी है। इसकी मिसाल कर्नाटक चुनाव के परिणाम हैं।

