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(आपातकाल) जेल में लगती थी आरएसएस की शाखा, गीत से गुंजता था परिसर

(आपातकाल) जेल में लगती थी आरएसएस की शाखा, गीत से गुंजता था परिसर

लखनऊ, 24 जून  देशभक्ति के ज्वार को आपातकाल में भी तत्कालीन केन्द्र सरकार नहीं रोक पायी। संचार व्यवस्थाएं ठप्प थीं। समाचार-पत्र, पत्रिकाओं पर बैन था। आन्दोलन कर नहीं सकते थे। आरएसएस पर प्रतिबंध था। इसके बावजूद छात्रों का आन्दोलन निरन्तर जारी रहा। आपातकाल के खिलाफ सत्याग्रह करते हुए छात्र भी जेल गए और वहां भी संघ की शाखा लगाने से स्वयंसेवकों को कोई रोक नहीं पाया। जब स्वयंसेवक देशभक्ति गीत गाते थे तो पूरा जेल परिसर गुंजायमान हो जाता था।

यह बातें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(आरएसएस) के प्रचारक, लोकतंत्र सेनानी और वनवासी कल्याण आश्रम पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्र संगठन मंत्री मनीराम पाल ने हिन्दुस्थान समाचार से विशेष वार्ता के दौरान बतायी।

वनवासी कल्याण आश्रम पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्र संगठन मंत्री मनीराम पाल ने बताया कि आपातकाल में विद्यार्थी भी बड़ी संख्या में सत्याग्रह कर जेल गये थे। उन्होंने बताया कि देश में 25 जून 1975 को आपातकाल लगाया गया और सबसे पहले सरकार ने 04 जुलाई, 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को प्रतिबंधित कर दिया। उस समय हम संघ के कार्यकर्ता थे और आजमगढ़ में पालीटेक्निक कर रहा था। जब संगठन ने तय किया तो हम आजमगढ़ में 11 विद्यार्थियों के साथ सत्याग्रहकर जेल गए। तीन महीने जेल में रहे। परीक्षा आ जाने के कारण तीन महीने के बाद हम विद्यार्थियों को छोड़ दिया गया। परीक्षा सम्पन्न होने के बाद हम लोग फिर संगठन के काम में जुट गए। संगठन की ओर से जो भी कार्यक्रम आते थे, उसे हमलोग करते थे।

उन्होंने बताया कि इंदिरा गांधी के जन्मदिवस पर पूरे शहर में इंदिरा गांधी मुर्दाबाद के पोस्टर लगाए गए। इन्दिरा गांधी के खिलाफ वॉल राईटिंग भी की गयी।

मनीराम पाल ने बताया कि जेल में भी शाखा लगती थी, खेल-कूद और बौद्धिक केे साथ ही देशभक्ति गीत भी होते थे। उन्होंने बताया कि जेल जाने के बाद घर वाले नाराज थे, मेरे पिताजी बेहद नाराज थे कि हमने घर की प्रतिष्ठा को गिरा दिया। जब तक जेल में रहा, घर से लोग मिलने नहीं आए। लेकिन संघ के प्रचारक लोग हमलोगों से मिलने आते थे। किसी के मन में कोई निराशा का भाव नहीं था। आज नहीं तो कल छूटेंगे ही।

उन्होंने बताया कि हमलोगों के मन में देशभक्ति की ज्वालाएं चरमोत्कर्ष पर थीं। तत्कालीन सरकार के प्रताड़ना से हमलोग भयभीत नहीं थे, भारत माता के लिए कष्ट सहने के लिए तैयार थे। हमलोग आपस में चर्चा भी करते थे कि इस भारत माता की आजादी के लिए कितने लोगों ने फांसी के फंदे को चुम्मा और अपना बलिदान किए। हमलोग भी जरूरत पड़ेगी तो इस भारत माता के लिए सबकुछ न्यौछावर कर देंगे।

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