
द्वापर युग मे जब द्रोपदी का वस्त्र हरण हो रहा था तब भगवान कृष्ण ने स्वयं लाज बचाई थी लेकिन आज के इस कलयुग में भारत माता के आबरू से खिलवाड़ करने वालो से कौन बचाने आएगा: दीक्षांत हिन्दुस्तानी
जिस देश मे नारियों का सम्मान पुरातन काल से एक पावन परंपरा रही हो अथवा जिस देश मे महिला को मातृदेवी के रूप में पूजा जा रहा हो अथवा स्त्री की महत्ता की सदा अहमियत रही हो उस देश मे आज बलात्कार व और अब सामूहिक बलात्कार जैसी आए दिन घृणित घटनाएं लगातार सामने आ रही हो तो नैतिक अवमूल्यन की पराकाष्ठा का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि मानव किस प्रकार पशुवत हो गया है।
आज देश के राज्य मणिपुर से जो शर्मनाक वीडियो मीडिया के माध्यम से घटना के 2 महीने पश्चात जनमानस के सामने आया है व उसके बाद लगी आग से झुलस रहा प्रदेश भारत को न केवल अपनी नजरो में बल्कि विश्वपटल पर भी आहत करने जैसा है। विगत दशकों में कभी निर्भया कांड तो कभी दामिनी कांड ने देश के दामन पर कलंकित दाग लगाया है। आखिर उस शिक्षा विकास प्रगति का क्या मूल्य जो एक नारी के सम्मान संस्कार के मायने को नही समझ सकती। द्वापर युग मे जब द्रोपदी का वस्त्र हरण हो रहा था तब भगवान कृष्ण ने स्वयं लाज बचाई थी लेकिन आज के इस कलयुग में भारत माता के आबरू से खिलवाड़ करने वालो से कौन बचाने आएगा। भीड़ की भीड़ मात्र मूकदर्शक होकर नजारा देखते हुए शायद मानो जैसे कि बस अपनी बहन बेटी की इज्जत के तार तार होते देखने के नजारे का इंतजार करती हो
कुछ हद तक पश्चिमी संस्कृति का अंधानुकरण, कुछ हद तक आधुनिकता के नाम पर नग्नता का बॉलीवुड फैशन तो कुछ हद तक नशा ड्रग्स इत्यादि की बात हो चाहे किसी धर्म जाती क्षेत्र हिंसा की बात तो लेकिन हर बार दांव पर स्त्री ही क्यो लगाई जाती हो भले कुछ बलात्कार के मामले झूठे ही दर्ज हो लेकिन वो भी महिला की सामाजिक इज्जत के आधार पर ही अपने स्वार्थपूर्ति करने हेतु ही किए जा रहे है आखिर कब तक नारी के अबला नही सबला होने के मात्र नारे ही लगाए जाएंगे धरातल पर ठोस कदमो का क्रियान्वयन क्यो नाकामयाब नजर आता है।
सचमुच यह देश के गौरव ही नही अपितु मर्यादा के लिए एक बड़ी चुनौती है।

