
लोगों के संघर्ष के कारण, कोका कोला के बाटलिंग प्लांट के बन्द होने के 18 साल बाद भी पानी का स्तर अभी ठीक नही हुआ है ।
(Veer Partap Rana ) केरला पलाचीमाडा, आमाल, जो अब 73 साल की है, यह पूछने पर उदास हो जाती है कि तीन दशक पहले उसके गांव पलाचीमाडा में जि़न्दगी कैसी थी। उस समय कोई बोरवैल नही थे तथा हर परिवार के पास अपनी ज़रूरत से अधिक पानी होता था। गर्मियों के शिखर के दिनों में ही, गांव अपने पानी के स्रोतों का सावधानी से प्रयोग करता था। 1999 में हालात उस समय बदल गये जब कोका-कोला ने इस शान्त गांव में अपने विशाल बोलटिंग युनिट के तौर पर चुना। अगले ही साल से, जैसे कि इसने इस क्षेत्र में से धरती के निचले पानी को निकालना शुरू किया, पलाचीमाडा के पानी का स्तर बहुत अधिक गिर गया तथा प्लांट में छोड़े गये ज़हरीले कूड़े ने मिट्टी को दबा दिया।
जैसे ही वहां के निवासी बहु-राष्ट्रीय कम्पनी को अपनी ज़मीन को हटाने के लिए सड़कों पर उतरे, उनके संघर्षों ने विश्व-व्यापी ध्यान खींचा।
आखिरकार 2004 में फैक्टरी को बन्द कर दिया गया जोकि लोगों के कुदरती विरोध की ताकत के कारण हासिल हुई जीत थी। फरवरी के पहले सप्ताह में कोका-कोला बाटलिंग प्लांट को पक्के तौर बन्द किये हुये 18 वर्ष हो जायेंगे पर पलाचीमाडा तथा इसके आस-पास के क्षेत्र आज भी इस के अत्याचारों से उभर नही सके हैं। अब, आमाल को अपनी परिवार के पांच लोगों के लिए पीने वाली पानी का एक घड़ा लाने के लिए एक दिन में लगभग 13 किलोमीटर की यात्रा मुश्किल इलाकों में करनी पड़ती है।

ईरवाला कबाईली भाईचारे से सम्बन्ध रखने वाली एक और कहती है,’’ हर बीते साल के साथ, पानी की कमी बहुत ज्यादा हो गई है तथा हमारी रोज़ी-रोटी खतरे में पड़ गई है।’’
बहुत सारी प्रदर्शनकारी उम्मीद छोड़ चुके थे, पर कुछ अभी भी कंपनी की ओर से किये गये नुक्सान की अदायगी करने के लिए तथा सरकार को अपनी किये गये चुनावी वायदे को पूरा करने के लिए मजबूर करने के लिए लड़ रहे हैं।
हिन्दोस्तान कोका-कोला बेवरेजिज़ प्राईवेट लिमटिड, अटलांटा स्थित सोफ्ट ड्रिंक्स के निर्माता की एक भारतीय सहायक कम्पनी ने 1999 में पलाचीमाडा में 38 करोड़ के प्लाट में अपनी फैक्टरी लगाई थी। यह फैक्टरी खेतीबाड़ी वाली ज़मीन पर लगाई गई थी जोकि आदिवासियों से सम्बन्धित थी।
कम्पनी केरल राज प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड की मंजूरी के अनुसार फैक्टरी की हद के अन्दर स्थित 6 बोर-कुओं से रोज़ाना 1.5 मिलीयन लीटर पानी निकाल सकती थी। जबकि, रिपोर्टो के अनुसार यह प्लांट साल 2000 में प्रति दिन 2 मिलीयन लीटर तक पानी निकाल रहा था।
स्थानीय आन्दोलन ने 2003 में उस वक्त विश्वव्यापी ध्यान खींचा जब बी.बी.सी के एक शो ’’फेस द फैक्टस’’ ने ऐक्स्टर युनिवर्सिटी की खोज का हवाला देकर बताया, जिसमें दिखाया गया था कि प्लांट से निकलने वाली गंदगी में कैडमीयम तथा लैड जैसी ज़हरीली धातुएं खतरनाक स्तर पर थीं। बचा हुआ उप-उत्पाद किसानों को खाद के तौर पर बेचा जा रहा था। इस शो के पेशकर्ता जौहन वेट ने युनिवर्सिटी के विज्ञानियों की खोजों को पढ़कर कहा, ’’क्षेत्र का कृषि उद्योग तबाह हो गया है तथा नौकरियों के साथ-साथ स्थानीय लोगों की सेहत को भी खतरे में डाल दिया गया है।’’

हारी हुई लड़ाई जीती?
प्रभावशाली बाटलिंग युनिट के बन्द प्रवेश द्वार से थोड़ी दूरी पर एक खस्ता हालत में ढांचा खड़ा है। यह वो दफ्तर था जहां पलाचीमाडा संघर्ष कमेटी कई वर्षों से काम करती रही। अधिकार कानून मौडे बारलो, जोसे बोवे तथा फिनलैंड के पूर्व मन्त्री सातू हस्सी उन लोगों में शामिल थे जिन्होेंने 2004 में गांव द्वारा आयोजित विश्व जल सम्मेलन दौरान समागम वाली जगह पर प्रदर्शनकारियों को सम्बोधन किया था।
’’असल में यह एक हारी हुई लड़ाई थी। जब शक्तिशाली कोका-कोला ने हमारे सख्त आन्दोलन के मद्देनज़र यूनिट को बन्द करने का फैसला किया तो दुनिया का हमारे ओर ध्यान गया। पर राज्य तथा केन्द्रीय की एक के बाद एक सरकारों ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जिसमें हमारे में से किसी को भी उन लोगों से कोई मुआवज़ा नही मिलेगा जिन्होंने हमारे जल स्रोतों को लूटा।
पूर्व सांसद पी.के. बिज्जू ने बताया कि केन्द्र सरकार में बैठी पार्टियों ने लोगों के हक में पास किये मत्ते के प्रति बी.जे.पी. तथा कांग्रेस दोनों ने गैर जि़म्मेदाराना रवैया अपनाया तथा गरीबो को मुआवज़ा देने का विरोध किया।
आन्दोलन का सार्वजनिक चेहरा रह चुके एक खेतीबाड़ी मज़दूर वेणुगोपाल कहते हैं,’’ सरकारें तथा राजनीतिक पार्टियां हमारी शिकायतो के बारे में सुस्त लगती हैं।’’ उनका कहना है कि गांव पिछले 19 सालों से कम्पनी द्वारा पानी के शोषण तथा इसके प्रभावों के विरूद्ध लड़ रहा है, पर लोगों का जीवन स्तर नही बदला तथा सरकारें कम्पनी के साथ खड़ी है।

’’केरल राज्य विधानसभा में पलाचीमाडा कोका-कोला पीडि़त राहत तथा मुआवज़ा क्लेम विशेष ट्रिब्यिूनल बिल को दोबारा पेश करने से पहले के वायदे के बावजूद, वामदल डैमोक्रेटिक फ्रंट (एल.डी.एफ) की सरकार ने हमारे जीवित रहने के साथ जुड़े मुद्दों पर चुप्पी साधे रखी हुई है। जो लोग कभी हमारे दुखों के बारे में बोलते थे, वो अब कुछ नही कर रहे,’’ वेणुगोपाल कहते हैं, जो कि पलाचीमाडा एैंटी कोका-कोला संघर्ष कमेटी के चेयरमैन भी हैं।
केरल विधानसभा द्वारा सर्वसम्मती से जो बिल 2011 को पास कर दिया गया था उस बिल को राष्ट्रपति ने पांच साल बाद वापिस कर दिया था। केन्द्रयी गृह मंत्राले ने इस बिल पर आपत्ति जताई थी तथा दावा किया था कि यह केन्द्रीय-राज्य सम्बन्धों के साथ टक्कर वाला है। इसने अपने केस का समर्थन करने के लिए नैशनल ग्रीन ट्रिब्यिूनल (एन.जी.टी.) एक्ट की कुछ व्यवस्थाओं का हवाला दिया।
2016 में अपनी चुनाव मुहिंम दौरान, एल.डी.एफ ने वायदा किया था कि वो इन विवादों को दूर करने के बाद बिल का दुबारा पेश करेगी ताकि इसको राष्ट्रपति की मन्ज़ूरी की ज़रूरत न पड़े।
बिल में कम्पनी तथा गांव के अन्य कुदरती स्रोतों का शोषण करने तथा जानबूझ कर प्रदूषित करने के इलावा धरती के निचले पानी को चिन्ताजनक तौर पर खतम करने का दोष लगाया गया था।
इसने मुख्य तौर पर पलाचीमाडा के गरीब, बेज़मीने लोगों के लिए विवादों के तेज़ी से निपटारे तथा मुआवज़े की वसूली के लिए एक विशेष ट्रिब्यिूनल स्थापित करने का भी वायदा किया। राज्य सरकार द्वारा बनाई गई एक माहिर कमेटी ने 216 करोड़ रूपए की मुआवज़ा राशि तय की है, पर कम्पनी ने अभी तक कुछ भी अदा नही किया है।
’’यह सच है कि फरवरी 2004 से फैक्टरी बन्द है। पर इसके कारण धरती के निचले पानी की चिन्ताजनक कमी हमें परेशान करती रहती है। पलाचीमाडा में बाटलिंग प्लांट लगने से पहले, हम अपने कुओं, खड्डों तथा नदियों पर पूरी तरह निर्भर थे,अरूमुगन पाथीचीरा, एक स्थानीय निवासी कहता है।’’ पेरूमेटी ग्राम पंचायत के मुख्य तौर पर कबायिली पलाचीमाडा गांव में लगभग 2000 निवासी है तथा उनके मुख्य व्यवसाय खेतीबाड़ी तथा खेत मज़दूरी हैं।
’’पेरूमेटी में जीवन को तबाह करने के लिए कोका-कोला से मुआवज़े के रूप में 216 करोड़ रूपए उपलब्ध करवाने के इलावा, बिल में धरती के निचले पानी की निकासी के लिए कम्पनी के खिलाफ कारवाई शुरू करने की व्यवस्था थी। इस में दलितों तथा कबायली लोगों के विरूद्ध अत्याचारों की रोकथाम वाले कानून के तहत कम्पनी के उच्च अधिकारियों पर मुकद्दमा चलाने की व्यवस्था भी थी। पर सभी बड़े सियासी मोर्चों ने हमें असफल कर दिया, ’’स्थानीय कबायली कारकुन्न नीलीपपारा मरियप्पन कहते हैं।’’
वेणुगोपाल कहते हैं, आज भी पलाचीमाडा तथा आस-पास के गांवों के कुओं के पानी का स्वाद खट्टा है।
राजनीतिक उदासीनता
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि केरल के दोनों प्रमुख सियासी मोर्चे-एल.डी.एफ. तथा यू.डी.एफ.ने बिल को दोबारा लागू करने की उनकी मांगों की ओर ध्यान नही दिया है।
’’ जब वी.एस. अचूथानंदन मुख्यमन्त्री थे तो राज्य विधानसभा के कानूनी माहिरों की राये लेने के बाद सर्वसम्मती से बिल पास कर दिया था, कि यह बिल राज्य के अधिकारों के अनुसार था। बहुत सारे कानूनी माहिरों का विचार था कि राष्ट्रपति की सहमति लेने की ज़रूरत नही है तथा राज्य का राज्यपाल इस को जारी कर सकता है। कम्पनी द्वारा हुये नुक्सान की जांच के लिए राज्य सरकार द्वारा बनाई गई पलाचीमाडा हाई-पावर कमेटी के तकनीकी मैंबर एस.फैज़ी ने इल्ज़ाम लगाया कि उस वक्त के सारे कानून मन्त्री तथा सी.पी.आई.(एम) नेता एम.विजै कुमार ने अपनी मन्त्री मंडल के साथियों तथा माहिरों को भरोसे में लिए बिना राष्ट्रपति की मन्ज़ूरी प्राप्त करने के लिए बिल केन्द्रीय गृह मन्त्राले को भेज दिया।’’
उन्होंने कहा,’’अब समय आ गया है कि केरल की सरकार तथा विरोधी पार्टियां इस बिल में से विवादपूर्ण हिस्सों, अगर कोई हैं, को हटाने के बाद उसी बिल को दोबारा पेश करें। विजै कुमार ने हफपोस्ट इंडिया को बताया कि उन्होंने आम प्रक्रिया के अनुसार बिल को आगे भेजा था तथा इसके पीछे कोई गुप्त मकसद नही था। फैज़ी ने केन्द्रीय गृह मन्त्राले की टिप्पणी कि यह बिल एन.जी.टी. एक्ट के विरूद्ध था, को गैर-यर्थाथक करार दिया। उन्होंने कहा कि एन.जी.टी सिरड़ अपनी स्थापना से साढे पांच साल पहले तक के मामलों में मुआवज़े के लिए पटीशन स्वीकार कर सकता है। वो कहते है, ’’एन.जी.टी. मई-2011 में ही कार्यशील हुआ था। पलाचीमाडा में कम्पनी द्वारा धरती के निचले पानी का शोषण तथा ज़हरीली गन्दगी 2002-2004 दौरान हुई थी।
’’केन्द्र की एन.टी.ए. सरकार ने बहु-राष्ट्रीय दिग्गजों के दवाब के आगे झुककर तथा राष्ट्रपति को बिल वापिस करने के लिए मजबूर करके धोखा किया। संघर्ष कमेटी के एक नेता विजयन अम्बालॉकड कहते हैं, ’’राज्य में एल.डी.एफ. तथा यू.डी.एफ. दोनों ने राष्ट्रपति की सहमति के बिना कानून को दोबारा बनाने की हमारी मांग का जवाब नही दिया है।’’ फैज़ी कहते हैं कि पलाचीमाडा संघर्ष धरती के निचले पानी तथा अन्य कुदरती स्रोतों की मलकीयत के बारे में महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है।
’’कम्पनी की स्थापना स्थानीय पंचायत के एतराज़ों को अनदेखा करके की गई थी। इनकी चेतावनियों की अक्सर उल्लंघना की जाती थी तथा इन को रद्द कर दिया जाता था। एक खेतीबाड़ी समाज के जल
स्रोतों को उद्ययोगिक प्रयोग के लिए मोड़ा गया था। क्या अब सरकारें प्रदूषण फैलाने वालों को मुआवज़ा भरने वालों को आज भी बचा रही हैं ?’’
ले देकर कई लोगों के साथ बातचीत करने के बाद तथा कई अखबारों की जांच-पड़ताल करने के बाद ऐसा लगता है कि यह राजनीतिक पार्टियां केवल लोगों से झूठे वायदे करके सत्ता में आती हैं तथा आकर सिर्फ सरमायेदारों के हित में फैसला लेती हैं तथा सरकार व विरोधी पक्ष सभी इन सरमायेदारों से धन इक्ट्ठा करने का काम करती हैं गरीबों की गरीबी का रोना रोकर उनको वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल करती हैं।
समय आ गया है लोगों के जागने का, नही तो इन राजनीतिक पार्टियों द्वारा आने वाले समय में सरमायेदारों के पास हमारी सांसों को भी गिरवी रख देना है। जब भी सेहत तथा पानी की दुश्मन कोका-कोला, पैप्सी तथा अन्य वातावरण तथा पानी प्रदूषित करने वाली फैक्टरियां के विरूद्ध आवाज़ उठाई जाती है तो आवाज़ उठाने वालों पर यही राजनीतिक पार्टियां झूठे पर्चे दर्ज करवा कर उनको जेलों में भेज देते हैं जो कि धीरे-धीरे हमारे समाज को गृह युद्ध की ओर ले जा रहा है।

यह समय राजनीतिक पार्टियों को दोबारा वातावरण प्रति अपना रवैया स्पष्ट करके ज़मीनी स्तर पर लागू करने का है, नहीं ते जल्द ही पंजाब के साथ-साथ पूरे भारत के हालात अफरीका के मारूस्थल जैसे हो जायेंगे।
नोटः यह लेख वीर प्रताप राणा द्वारा पंजाब के होशियारपुर-ऊना सड़क पर लगी कोका-कोला कम्पनी के विरोध दौरान की गई जांच-पड़ताल तथा कई उन शहरों के लोगों के साथ जिन्होंने कोका-कोला के खिलाफ संघर्ष छेड़ा हुआ है, के साथ बातचीत करने के बाद लिखा।

