
नई दिल्ली, 04 सितंबर । सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान बेंच ने सोमवार को अनुच्छेद 370 को लेकर दाखिल की गई याचिकाओं पर पंद्रहवें दिन की सुनवाई पूरी कर ली है। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस मामले पर अगली सुनवाई कल 5 सितंबर को करने का आदेश दिया।
आज सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंच के जजों ने याचिकाकर्ता अकबर लोन की तरफ से जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पाकिस्तान समर्थित नारेबाजी पर सवाल किया। इस पर वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि हममें से कोई भारत की संप्रभुता को चुनौती नहीं दे रहा। लोन सांसद हैं और उन्होंने संविधान की शपथ ली है। तब सुप्रीम कोर्ट ने सिब्बल से कहा कि उनसे कहिए कि संविधान के प्रति निष्ठा का हलफनामा दाखिल करें, क्योंकि जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा है।
दरअसल, कश्मीरी पीड़ितों के संगठन ‘रूट इन कश्मीर’ ने सांसद लोन पर आरोप लगाया है कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा में उन्होंने पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा लगाया था। वह अब अनुच्छेद 370 हटाने को चुनौती देने वाले प्रमुख याचिकाकर्ता हैं।
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अकबर लोन को भारत के संविधान के प्रति निष्ठा रखने को लेकर हलफनामा दाखिल करना चाहिए। उन्हें हलफनामे में बताना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और अलगाववाद का विरोध करते हैं। वह कोई आम आदमी नहीं बल्कि सांसद हैं। केंद्र का कहना है कि अगर कोर्ट इस पर कुछ नहीं करेगा तो इससे दूसरों को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
केंद्र की ओर से एएसजी केएम नटराज ने दलील देते हुए कहा कि अनुच्छेद 370 एकमात्र ऐसा प्रावधान है, जिसमें खुद ही खत्म हो जाने की व्यवस्था है। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 किसी भी प्रकार का अधिकार प्रदान नहीं करता है। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 का लागू रहना भेदभावपूर्ण है और मूल ढांचे के विपरीत है। जहां तक 370 का सवाल है, संघवाद के सिद्धांत के तहत कड़े अर्थों में इसका कोई अनुप्रयोग नहीं है।
गुर्जर बकरवाल समुदाय के सदस्य की तरफ से वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी ने हस्तक्षेप याचिका पर तर्क देते हुए कहा कि वह एक अनुसूचित जनजाति के सदस्य हैं और वह जम्मू-कश्मीर की कुल अनुसूचित जनजाति की आबादी का 73.25 प्रतिशत हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के संशोधन का समर्थन इस कारण से करते हैं क्योंकि अनुसूचित जनजातियों से संबंधित संविधान के प्रावधान कभी लागू नहीं किए गए थे। महेश जेठमलानी ने कहा कि जहां तक राजनीतिक संप्रभुता का सवाल है यह राज्य की तरह संघ में निहित है इसका पता प्रस्तावना पर एक नजर डालने से यह पता चल जाएगा कि दोनों की प्रस्तावना संघ और जम्मू-कश्मीर सामने है। संघ में संप्रभु शब्द महत्वपूर्ण है। जम्मू-कश्मीर संविधान प्रस्तावना देखें तो उसके प्रस्तावना में संप्रभुता का कोई उल्लेख नहीं है। यह संघ और राज्य के मौजूदा संबंधों को परिभाषित करता है। यह राज्य पर संघ की संप्रभुता की स्वीकृति है।
तब चीफ जस्टिस ने कहा कि तो आप स्वीकार करते हैं कि संप्रभुता के दो अर्थ हैं- एक, बाहरी जो संघ में निहित है, और आंतरिक संप्रभुता जो बाद में संघ और राज्य के बीच है। जेठमलानी ने सहमति देते हुए कहा कि हां, लेकिन संविधान की परिकल्पना है कि समय-समय पर अन्य प्रावधान लागू किए जाएं। अनुच्छेद 370(3) इस तथ्य का संकेत है कि अंतिम कानूनी संप्रभुता भारत संघ के पास है। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 एक ऐसा प्रावधान है, जो संविधान के अस्थायी प्रावधानों का हिस्सा है। इस अनुच्छेद का शीर्षक प्रावधान को अस्थायी प्रावधानों के रूप में वर्णित करता है।
जेठमलानी ने कहा कि 1948 से 1950 तक के सभी संवैधानिक दस्तावेज़ यह संकेत करते हैं कि संविधान बनाने के उद्देश्य से एक संविधान सभा आवश्यक थी। यही कारण है कि अनुच्छेद 370(3) में संविधान सभा का उल्लेख किया गया है। जेठमलानी ने कहा कि इस मुद्दे के मूल में तीन सवाल हैं। पहला क्या अनुच्छेद 370 अस्थायी या स्थायी है। दूसरा क्या जम्मू-कश्मीर संविधान सभा को विघटन का प्रतिपादन किया गया। अनुच्छेद 370(3) का उद्देश्य क्या है। तीसरा क्या 5 अगस्त का राष्ट्रपति का आदेश संवैधानिक रूप से वैध था।
23 अगस्त को याचिकाकर्ताओं की ओर से दलीलें पूरी कर ली गईं। पांच सदस्यीय बेंच में चीफ जस्टिस के अलावा जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत शामिल हैं। बता दें कि 2 मार्च 2020 के बाद इस मामले को पहली बार सुनवाई के लिए लिस्ट किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में कहा गया है कि अनुच्छेद 370 हटाने के बाद केंद्र सरकार ने कई कदम उठाए हैं। केंद्र सरकार ने राज्य के सभी विधानसभा सीटों के लिए एक परिसीमन आयोग बनाया है। इसके अलावा जम्मू और कश्मीर के स्थायी निवासियों के लिए भी भूमि खरीदने की अनुमति देने के लिए जम्मू एंड कश्मीर डवलपमेंट एक्ट में संशोधन किया गया है। याचिका में कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर महिला आयोग, जम्मू-कश्मीर अकाउंटेबिलिटी कमीशन, राज्य उपभोक्ता आयोग और राज्य मानवाधिकार आयोग को बंद कर दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2 मार्च 2020 को अपने आदेश में कहा था कि इस मामले पर सुनवाई पांच जजों की बेंच ही करेगी। सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंच ने मामले को सात जजों की बेंच के समक्ष भेजने की मांग खारिज कर दी थी।

