
आपातकाल: संघ ने खोजा विपदा में अवसर
विराग पाचपोर
मैं ऐसा मानता हूं कि कुछ ऐसे क्षण हर किसी राष्ट्र के इतिहास में आते हैं, जब उसके लोगों की परीक्षा की घड़ी होती है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में आपातकाल एक ऐसा ही मोड़ था जिसने देश को हिला कर रख दिया। एक व्यक्ति की राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण, समूचे देश को उन्नीस माह के प्रदीर्घ काल तक कारागार में परिवर्तित कर दिया। हजारों, लाखों निरपराध नागरिकों को बिना कारण जेलों में ठूंसा गया। विपक्षी राजनीतिक दलों के नेताओं को भी जेल में ही सड़ने छोड़ दिया गया।
परंतु, सबसे अधिक आघात, वह जिसका राजनीति से संबंध नहीं, ऐसे सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर किया गया। वर्ष 1975 के 26 जून की बात है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी कुर्सी बचाने के लोभ में लोकतंत्र का गला घोंट कर संपूर्ण भारत को आपातकाल की भट्टी में झोंक दिया। और, भयंकर दमन चक्र चलाकर जनता में भय के वातावरण का निर्माण कर दिया। चार जुलाई 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ और भी अनेक संगठनों को गैरकानूनी घोषित कर पाबंदी लगा दी गई और उनके नेताओं कों जेल में बंद कर दिया गया। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह शायद ऐसा एक अवसर था जहां कहीं पर भी आशा की किरण दिखाई नहीं देती थी।
लोकतंत्र का गला घोंटने के साथ सामान्य जनता का मौलिक अधिकार भी छीन लिया गया था। जो स्वयंसेवक या कार्यकर्ता जेलों में बंद किए गए थे उनका अमानुष छल किया गया। परंतु, इस अंधकार से देश को पुनः एक बार लोकतंत्र की राह पर लाने का एक ऐतिहासिक और साहसिक कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हजारों- लाखों स्वयंसेवकों के कारण संपन्न हुआ।
उस समय जितने लोगों को जेलों में बंद किया गया था उनमें सर्वाधिक संख्या संघ के स्वयंसेवकों की थी। इस नियति के आघात का संघ और संघ नेतृत्व ने इस प्रकार से उपयोग किया कि आपातकाल के बाद जैसे ही पाबंदियां हटीं, संघ का विस्तार समाज के हर क्षेत्र में हो सका। इसके लिए उस समय के सरसंघचालक बालासाहेब देवरस जी का नेतृत्व एवं मार्गदर्शन अत्यंत ही महत्वपूर्ण रहा है। ‘मॉडर्न रिव्यू’ जैसे समाचार पत्रों ने संघ के इस योगदान का खुलकर समर्थन किया है।
परंतु, दुर्भाग्य की बात ऐसी है कि आपातकाल के उपरांत शायद बीसवीं सालगिरह होगी, एक तथाकथित बड़े अंग्रेजी अखबार ने एक विशेषांक प्रकाशित किया था जिसमें अनेक मान्यवर लोगों के लेख इत्यादि छपे थे परंतु किसी ने भी आपातकाल हटाने में और लोकतंत्र की बहाली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महत्वपूर्ण योगदान की चर्चा तो दूर रही, उसका उल्लेख भी नहीं किया। जबकि वास्तविकता यह है, कि आज जो नागरिकों के मौलिक अधिकार और लोकतंत्र पनप रहा है उसका सारा श्रेय संघ के स्वयंसेवकों को ही जाता है।
आपातकाल के दौरान और एक ऐतिहासिक घटना हुई। संघ के साथ ‘जमात ए इस्लामी’ इस मुस्लिम संगठन के कई नेता और कार्यकर्ता भी जेल में बंद थे। उनके साथ में संघ के लोगों का संवाद प्रारम्भ हुआ। उस संवाद के कारण मुस्लिम समाज के भीतर संघ को लेकर जो भ्रांत धारणाएं फैलाई गई थीं, जो भय उनके दिलो में बिठाया गया था, वो सारी धारणाएं ध्वस्त हो गईं। इसलिए, आपातकाल के बाद संघ और मुस्लिम समाज में संवाद का एक दौर प्रारंभ हुआ। इसकी परिणिति आगे चलकर मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के रूप में मुस्लिम समाज में वतनपरस्ती और हुब्बल वतनी का भाव जागरण करने में हुई है।
आपातकाल के उपरांत बालासाहेब देवरस जी के नेतृत्व में संघ ने देश के सुदूर इलाको में संघ शाखाओं का जाल तो बढ़ाया ही, उसी प्रकार समाज के दुबले, वंचित और शोषित घटकों के लिए सेवा कार्यों का एक बड़ा नेटवर्क भी खड़ा किया। उस सेवा कार्यों के कारण आर. एस. एस. को लोग ‘रेडी फॉर सेल्फलेस सर्विस’ ऐसा भी कहने लगे।

